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ॐ नमो गोभ्यः |

श्री सदगुरुदेव भगवान भक्तमाली श्री गणेशदास जी महाराज का गो सेवा से सम्बंधित महत्वपूर्ण उपदेश –

संपूर्ण भारतीय संस्कृति का मूल आधार गोमाता ही है । और भारतवर्ष का अस्तित्व भी गो पर ही आधारित है । गोवंश भारत की कृषि और अर्थव्यवस्था का मेरुदंड है, उसकी सेवा और रक्षा प्रत्येक नागरिक का परमधर्म है । आप विश्वास कीजिए – “गाय बचेगी तो देश बचेगा ” । आज इस समय पृथ्वी को सुशोभित करने में इन सात की मुख्य भूमिका है ।

गोभिर्विप्रैश्च वेदैश्च सतीभिः सत्यवादिभिः । अलुब्धैर्दानशीलैश्च सप्तभिर्धायते महीः ।।

यह महिमामंडित पृथ्वी गो, ब्राह्मण , वेद , सती साध्वी नारियों, सत्यवादी महानुभावों, लोभरहित सद्पुरुषों एवं सात्विक वृति से भगवत धर्मानुसार दान देने वाले मनुष्यों के द्वारा धारण की गयी है । शास्त्रानुसार प्रसिद्ध इन सात पृथ्वी के धारणकर्ता स्तंभो में गोमाता का सर्वप्रथम स्थान है । शेष सब इसके अनुगत है आश्रित हैं ।

इसी सिद्धांत का गोस्वामी श्री तुलसीदास जी ने अनुशीलन किया – गोद्विज धेनु देव हितकारी । कृपासिंधु मानव तनु धरी ।। (रा.च.मा. ५/३९/३) इस अर्धाली में गोस्वामी पाद ने गो व धेनु इन दो शब्दो का समानार्थक प्रयोग इसी अभिप्राय से किया है की जिससे प्रथम “गो” शब्द भले ही अनेकार्थक मान लिया जाय , किन्तु धेनु शब्द तो सम्यक प्रकारेण गोमाता का ही बोधक है , कारण की गो हमारी संस्कृति का अविभाज्य अंग है । अतः दृष्टि में मानव जीवन का सर्वोत्कृष्ठ फल गोवंश की रक्षा , संरक्षण – संवर्धन हेतु तन-मन-धन से लग जाने में ही है । इसी पवन संकल्प के साथ भारत के संत – महापुरुषों का स्नेह , सौहार्द व कृपा करुणा का बल लेकर व्रज चौरासी सीमान्तर्गत डीग राजस्थान में श्री व्रज कामद सुरभि वन एवं शोध संस्थान, श्री जड़खोर गोधाम की स्थापना की गयी है । यथाशीघ्र हम सबके श्रद्धा समन्वित संगठित प्रयासों से कुछ ही समय में यह एक विशाल दिव्य वैट वृक्ष का स्वरुप धारण कर व्रज चौरासी कोस में समग्र विश्व से पधारे आगन्तुक, दर्शनार्थी व प्रदिक्षणार्थी यहाँ से गो सेवा की प्रेरणा लेकर जायें ऐसा विनम्र प्रयास है।
संरक्षण एवं संवर्धन के साथ-साथ गोमाता के सम्पूर्ण देवत्व पर एक विशेष शोधकार्य – जिसे सुन समझकर लगे की हम त्रयताप ग्रसित प्राणियों ने गो सेवा में बहुत विलंब कर दिया । और अंत में आप सभी गोसेवी भगवच्चरणानुरागी सज्जनो से गो को अपने जीवन में अंगी बना ले , शेष अन्य व्यापारादि सम्पूर्ण व्यवहार जगत को अंग बना ले तो समष्टि जगत में प्राणी मात्र का सम्यक प्रकारेण मंगल हो जायेगा । ऐसी मेरी आप सब को शुभकामना है ।

गो, ब्राह्मण, साधू इन तीनो पर संकट है । घोर कलिकाल है । इन तीनो में सर्वाधिक संकट गाय पर है । गाय का वध किया जा रहा है । ऐसी अवस्था में अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा गो सेवा में लगानी चाहिए । और कार्यो में भले ही कमी आ जायें पर गो सेवा में कमी नही आणि चाहिए । गो सेवा से बढ़कर पुण्य कर्म इस दुनिया में कोई नही है । यदि गो सेवा नही करोगे तो गो सेवा के सम्बन्ध में एक वाक्य भी कहने के अधिकारी नही रहोगे । अतः गो सेवा ही गोविन्द की प्रसन्नता का सर्वोपरि साधन है ।

महंत राजेंद्र दास

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